Friday, July 19, 2024
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कांवड़ यात्रा 2024: आखिर कैसे शुरू हुई कांवड़ यात्रा की परंपरा, जाने पौराणिक कथा और महत्व।

सावन का महीना देवों के महादेव को बेहद प्रिय है। इस माह में भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसके साथ ही विधिपूर्वक सोमवार का व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से मनचाहे वर की प्राप्ति होती है। विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य पाने के लिए सावन के हर मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए भी मंगलवार का व्रत करती हैं। हिंदू धर्म में सावन का महीना भगवान शिव की कृपा पाने के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। यह महीना खास भोलेनाथ की पूजा करने के लिए समर्पित होता है।

हर साल सावन के महीने में लाखों की संख्या में भगवान शिव के भक्त गंगा नदी से जल लेकर अपने पास के शिव मंदिरों में शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। कांवड़ यात्रा करने वाले भक्तों को कांवड़िया या भोला कहा जाता है। कांवड़ यात्रा में कांवड़िए पैदल और कुछ वाहनों से भी यात्रा करते हैं। कांवड़ यात्रा हर साल सावन के महीने में शुरू होती है और सावन महीने की त्रयोदशी तिथि यानी सावन शिवरात्रि पर भगवान शिव को जल चढ़ाने का विधान है।

लेकिन आप जानते हैं कि कांवड़ यात्रा की शुरुआत कैसे हुई? अगर नहीं पता, तो आइए आपको इस बारे में विस्तार से बताते हैं।

पौराणिक कथा के मुताबिक, त्रेता युग में श्रवण कुमार के अंधे माता-पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा जाहिर की थी। ऐसे में उनके पुत्र श्रवण कुमार ने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर कंधे पर उठाकर पैदल यात्रा की और उन्हें गंगा स्नान करवाया. इसके बाद उन्होंने वहां से गंगाजल लेकर भगवन शिव का विधिपूर्वक अभिषेक किया। धार्मिक मान्यता है कि तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई।

वही कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर एक और दूसरी कथा भी प्रचलित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को पीने से शिवजी का गला जलने लगा। इस स्थिति में देवी-देवताओं ने गंगाजल से प्रभु का जलाभिषेक किया, जिससे प्रभु को विष के प्रभाव से मुक्ति मिल गई। ऐसा माना जाता है कि तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई।

कांवड़ यात्रा के पीछे एक और पौराणिक मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले भगवान शिव विष पीकर पूरी दुनिया की रक्षा की थी। विषपान करने से शिवजी का कंठ नीला पड़ गया था, जिस वजह से उन्हें नीलकंठ कहा जाता है।ऐसा कहते हैं इसी विष के प्रकोप को कम कर उसके प्रभाव को ठंडा करने के लिए ही शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाता है। इस जलाभिषेक से प्रसन्न होकर भगवान शिव भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

इस साल सावन का महीना 22 जुलाई से शुरू होकर 19 अगस्त तक चलेगा। 19 अगस्त 2024 को भाई-बहनों का पर्व रक्षाबंधन मनाया जाएगा। इस साल कांवड़ यात्रा 22 जुलाई से शुरू होगी जो कि सावन माह की शिवरात्रि पर समाप्त होती है। सावन माह की शिवरात्रि इस बार 2 अगस्त को है. ऐसे में इस दिन सभी कांवड़िए जल लेकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। कांवड़ यात्रा भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने का एक सबसे शुभ और उत्तम मानी गई है। धार्मिक मान्यता है कि सावन के महीने में कांवड़ उठाने वाले भक्त के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और कांवड़ के जल से शिवलिंग का अभिषेक करने पर सालभर भोलेनाथ की कृपा बनी रहती है। साथ ही कष्ट, दोष, और कंगाली से छुटकारा मिलता है.कांवड़ यात्रा करने वाले शिव भक्तों को कांवड़िया कहा जाता है। कांवड़ यात्रा पर जाने वाले भक्तों को इस यात्रा के सख्त नियमों का पालन करना पड़ता है। इस दौरान भक्तों को पैदल ही पूरी यात्रा करनी पड़ती है। साथ ही यात्रा के दौरान भक्तों को तामसिक भोजन से दूर रहकर सिर्फ सात्विक भोजन ही करना होता है।

इसके अलावा, आराम करते समय कांवड़ को जमीन पर रखना वर्जित होता है, बल्कि कांवड़ को किसी पेड़ पर लटकाया जाता है. कांवड़ को जमीन पर रखने से वह अपवित्र हो जाता है जिसके बाद दोबारा से गंगाजल भरकर फिर यात्रा शुरू करनी पड़ती है। कांवड़ यात्रा के दौरान भक्त नंगे पांव चलते हैं और स्नान करने के बाद ही कांवड़ को छुआ जाता है।

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