Friday, February 23, 2024
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आठ साल के इंतजार के बाद छमनियां स्टेडियम का निर्माण कार्य पूरा! जल्द ही खेल विभाग को जाएगा सौंपा

आठ साल के लंबे इंतजार के बाद चंपावत जनपद के लोहाघाट छमनियां स्टेडियम का निर्माण कार्य पूरा हो गया है। वर्ष 2015 में स्टेडियम का निर्माण कार्य शुरू किया गया था। छह हेक्टेयर क्षेत्र में बन रहा यह स्टेडियम जिले का सबसे बड़ा स्टेडियम है। इसके निर्माण में 1092.68 लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं। निर्माण कार्य दिसंबर 2021 में पूरा होना था, लेकिन समय से बजट न मिलने और निम्न गुणवत्ता की जांच के घेरे में आने के कारण समय पर स्टेडियम बनकर तैयार नहीं हो पाया। कार्यदायी संस्था यूपी निर्माण निगम के एई पुष्पेंद्र वर्मा ने बताया कि स्टेडियम का निर्माण कार्य पूरा हो गया है। सुरक्षा दीवार, ट्रैक, टेरिस कटिंग, मैदान समतलीकरण, ड्रेनेज निर्माण, ब्रिक वर्क का कार्य पहले ही पूरा कर लिया गया था।

बहुउद्देश्यीय भवन के भूतल और दूसरे फ्लोर का निर्माण कार्य पूरा भी हो गया है। अंडर ग्राउंड टैंक, रेन वाटर हार्वेस्टिंग टैंक भी बना दिए गए हैं। अंतिम चरण में बहुउद्देश्यीय भवन के भूतल की फिनीशिंग के साथ रंग रोगन किया जा रहा है। बताया कि 15 मार्च तक स्टेडियम को खेल विभाग को हस्तांतरित कर दिया जाएगा। स्टेडियम में युवाओं को खेल प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त आधारभूत सुविधाएं मिलेंगी, साथ ही राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं का आयोजन होगा। स्टेडियम में एथलेटिक्स, फुटबाल, हाकी, क्रिकेट, वालीबाल, हैंडबाल, बास्केटबाल, बैडमिंटन, मुक्केबाजी और कराटे का प्रशिक्षण देने के साथ इन खेलों की क्षेत्रीय, जिला एवं राज्य स्तरीय प्रतियोगिताएं होंगी। साथ ही बाहर से आने वाले खिलाड़ियों को हर प्रकार की सुविधा मिलेगी। स्टेडियम के निर्माण कार्य में देरी से जिले के युवाओं को काफी नुकसान उठाना पड़ा है। पहले चरण में निर्माण कार्य में घटिया गुणवत्ता का लेबल चस्पा होने के बाद से ही स्टेडियम विवादों में रहा। वर्ष 2018 में ग्रामीणों की शिकायत पर तत्कालीन डीएम ने रुड़की के इंजीनियरों की टीम बुलाकर कार्यों की तकनीकि जांच कराई। इस जांच में निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की भारी कमी पाई गई। वर्ष 2020 में तत्कालीन डीएम ने एक बार फिर लोहाघाट के तत्कालीन एसडीएम आरसी गौतम की अध्यक्षता में लोनिवि लोहाघाट के इंजीनियरों से तकनीकि जांच कराई। इधर जांच के दायरे में आने के बाद से शासन ने शेष किश्तों का भुगतान नहीं किया। फलस्वरूप निर्माण कार्य तीन साल तक अधर में लटक रहा। बाद में अवशेष बजट जारी कर दिया गया लेकिन कार्य की गति सुस्त पड़ी रही।

 

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