रुड़की। जल संसाधनों के प्रबंधन और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की एक बार फिर दुनिया के दिग्गज वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं का केंद्र बन गया है। सोमवार, 23 फरवरी 2026 से संस्थान में तीन दिवसीय 'चौथे रुड़की वाटर कॉन्क्लेव' का भव्य आगाज हुआ। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान के सहयोग से आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया भर के शोधकर्ता 'नेक्सस दृष्टिकोण के माध्यम से सीमापार जल सहयोग' विषय पर मंथन कर रहे हैं। कॉन्क्लेव के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में नीति आयोग के सदस्य डॉ. विनोद के. पॉल ने वर्चुअली शिरकत की। उन्होंने बढ़ते जल संकट और कृषि-ऊर्जा-खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उद्घाटन समारोह का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्वलन और कुलगीत के साथ हुआ।
IIT रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने अपने संबोधन में एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा, "आज जल सुरक्षा केवल पीने के पानी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध जलवायु सहनशीलता और खाद्य प्रणालियों से है। वर्तमान में एआई (AI) डेटा सेंटरों के बढ़ते उपयोग के कारण जल की मांग में भारी वृद्धि हो रही है। ऐसे में रुड़की वाटर कॉन्क्लेव जैसे मंच वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर वैश्विक साझेदारी को प्रोत्साहित करने का काम करते हैं। इस वर्ष के कॉन्क्लेव का मुख्य विषय 'सीमापार जल सहयोग है। अक्सर नदियों के जल बंटवारे को लेकर दो देशों या राज्यों के बीच विवाद की स्थिति बनी रहती है। वैज्ञानिक इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि कैसे 'नेक्सस अप्रोच' (जल-ऊर्जा-खाद्य का अंतर्संबंध) के जरिए इन विवादों को सुलझाया जा सकता है और संसाधनों का समान वितरण सुनिश्चित किया जा सकता है।
सम्मेलन के संयोजक प्रो. आशीष पांडे ने बताया कि इस बार कॉन्क्लेव में दुनिया के 15 से अधिक देशों के 42 मुख्य वक्ता शामिल हो रहे हैं। इनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, यूके, इजराइल, जापान, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के वैज्ञानिक शामिल हैं। ये विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन, हाइड्रो-मौसमीय चरम घटनाओं (बाढ़ और सूखा), भूजल स्थिरता और जल गुणवत्ता जैसे गंभीर विषयों पर अपने शोधपत्र और नवाचारी समाधान पेश करेंगे। RWC-2026 की सबसे बड़ी विशेषता इसका विशिष्ट पैनल है, जहाँ विज्ञान और नीति के साथ जमीनी नेतृत्व का संगम देखने को मिला। जल संरक्षण के क्षेत्र में क्रांति लाने वाले पद्मश्री सवजीभाई धोलकिया, पोपटराव पवार, भरत भूषण त्यागी और उमाशंकर पांडे जैसे सामुदायिक नायकों ने अपने अनुभव साझा किए। इसके साथ ही एनएमसीजी के पूर्व महानिदेशक राजीव रंजन मिश्रा और नीति आयोग के कार्यक्रम निदेशक युगल जोशी जैसे वरिष्ठ नीति-निर्माताओं ने इस बात पर चर्चा की कि कैसे वैज्ञानिक अनुसंधान को सरकारी नीतियों और सामुदायिक सहभागिता के साथ जोड़कर एक सुदृढ़ 'जल शासन ढांचा' तैयार किया जा सकता है। तीन दिनों तक चलने वाला यह द्विवार्षिक सम्मेलन 25 फरवरी तक जारी रहेगा। IIT रुड़की का यह प्रयास न केवल अकादमिक शोध को बढ़ावा देगा, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर जल कूटनीति के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करने वाला साबित होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यहाँ से निकले निष्कर्ष भविष्य की जल नीतियों का आधार बनेंगे।

